जब हम होम लोन, कार लोन या पर्सनल लोन लेते हैं, तो हमारे दिमाग में सबसे पहली बात यही आती है—“मेरी महीने की किश्त (EMI) कितनी होगी?” अक्सर लोग EMI कम रखने के चक्कर में लोन की अवधि (Tenure) लंबी चुन लेते हैं। यह सुनने में अच्छा लगता है कि हर महीने जेब से कम पैसे जाएंगे, लेकिन हकीकत में आप बैंक को लाखों रुपये ज्यादा चुका रहे होते हैं।
आइए इसे विस्तार से समझते हैं।
1. EMI क्या है और यह कैसे बनती है?
EMI (Equated Monthly Installment) वह निश्चित राशि है जो आप हर महीने बैंक को चुकाते हैं। इसमें दो चीजें शामिल होती हैं:
- मूलधन (Principal Amount): जो पैसा आपने उधार लिया है।
- ब्याज (Interest): उस उधार पैसे पर बैंक का प्रॉफिट।
शुरुआत में, आपकी EMI का बड़ा हिस्सा सिर्फ ब्याज (Interest) चुकाने में जाता है, और मूलधन (Principal) बहुत धीरे-धीरे कम होता है। जैसे-जैसे समय बीतता है, ब्याज का हिस्सा कम होता जाता है और मूलधन का हिस्सा बढ़ता है।
EMI का गणितीय फॉर्मूला (Mathematical Formula)
बैंक EMI निकालने के लिए जिस फॉर्मूले का इस्तेमाल करते हैं, वह यह है:
यहाँ:
- E = EMI (मासिक किश्त)
- P = Principal (लोन की राशि)
- r = मासिक ब्याज दर (सालाना दर / 12 / 100)
- n = Tenure (महीनों की संख्या)
2. ‘Tenure’ का जाल: समय बढ़ाने पर ब्याज कैसे बढ़ता है?
यह सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है। जब आप लोन चुकाने का समय (Tenure) बढ़ाते हैं, तो गणितीय रूप से हर महीने की किश्त छोटी हो जाती है क्योंकि वह राशि ज्यादा महीनों में बंट गई है। लेकिन, चूंकि पैसा आपके पास ज्यादा समय तक रहा, बैंक उस पर ज्यादा समय तक ब्याज लगाता है।
आइए इसे एक उदाहरण (Example) से समझते हैं।
मान लीजिए आप ₹10 लाख का पर्सनल लोन 10.5% की ब्याज दर पर ले रहे हैं। हम दो स्थितियों की तुलना करेंगे:
- स्थिति A: लोन 5 साल (60 महीने) के लिए।
- स्थिति B: लोन 10 साल (120 महीने) के लिए।
तुलना (Comparison Table)
| विवरण (Details) | स्थिति A (5 साल) | स्थिति B (10 साल) | निष्कर्ष (Result) |
|---|---|---|---|
| लोन राशि | ₹10,00,000 | ₹10,00,000 | समान |
| अवधि (Tenure) | 60 महीने | 120 महीने | समय दोगुना |
| EMI (हर महीने) | ₹21,494 | ₹13,493 | ₹8,000 की मासिक बचत |
| कुल ब्याज (Total Interest) | ₹2,89,633 | ₹6,19,220 | ₹3.3 लाख का भारी नुकसान |
| कुल भुगतान (Total Paid) | ₹12,89,633 | ₹16,19,220 | – |
विश्लेषण (Analysis):
- मासिक राहत: 10 साल का लोन लेने पर आपकी EMI ₹21,494 से घटकर ₹13,493 हो गई। आपको लगा कि आपने हर महीने ₹8,000 बचा लिए।
- लंबी अवधि का नुकसान: 5 साल के लोन में आप सिर्फ ₹2.90 लाख ब्याज देते। वहीं 10 साल के लोन में आप ₹6.19 लाख ब्याज दे रहे हैं।
- निष्कर्ष: सिर्फ EMI कम करने के चक्कर में आपने बैंक को ₹3,30,000 (3.3 लाख) ज्यादा दे दिए, जो कि आपके मूल लोन (10 लाख) का 33% है!
3. ऐसा क्यों होता है? (Compounding Effect)
ब्याज की गणना आपके बकाया मूलधन (Outstanding Principal) पर होती है।
- जब आप लंबी अवधि चुनते हैं, तो EMI छोटी होने के कारण ‘मूलधन’ (Principal) बहुत धीरे-धीरे घटता है।
- चूंकि मूलधन लंबे समय तक बड़ा बना रहता है, बैंक उस पर हर महीने ब्याज जोड़ता रहता है।
- शुरुआती सालों में तो 10 साल वाले लोन में आपकी EMI का लगभग 60-70% हिस्सा सिर्फ ब्याज में चला जाता है, लोन वही का वही खड़ा रहता है।
4. सही फैसला कैसे लें? (Smart Strategy)
लोन लेते समय सिर्फ EMI न देखें, बल्कि ‘Total Interest Payable’ (कुल देय ब्याज) पर ध्यान दें। यहाँ कुछ स्मार्ट तरीके हैं:
- कम से कम अवधि चुनें: उतनी ही EMI चुनें जिसे आप थोड़ा मुश्किल से ही सही, पर चुका सकें। इसे “Comfort Zone” में न रखें।
- Pre-payment (समय से पहले भुगतान): अगर आपने लंबी अवधि का लोन ले भी लिया है, तो जब भी आपके पास बोनस या एक्स्ट्रा पैसा आए, उसे लोन अकाउंट में डाल दें। इससे आपका मूलधन (Principal) सीधे कम होगा और ब्याज की राशि अपने आप गिर जाएगी।
- हर साल EMI बढ़ाएं: अगर आपकी सैलरी बढ़ती है, तो बैंक से बात करके अपनी EMI को हर साल 5% या 10% बढ़वा लें। इससे 20 साल का लोन 12-13 साल में खत्म हो सकता है।
निष्कर्ष
लोन की अवधि (Tenure) बढ़ाना एक “मीठा जहर” है। यह आज आपको कम EMI का सुकून देता है, लेकिन भविष्य में आपकी गाढ़ी कमाई का एक बड़ा हिस्सा ब्याज के रूप में खा जाता है। इसलिए, हमेशा Maximum EMI और Minimum Tenure का नियम अपनाएं जो आपके बजट में फिट बैठता हो।
क्या आप किसी विशिष्ट लोन राशि (जैसे होम लोन या कार लोन) के लिए यह कैलकुलेशन देखना चाहेंगे? मैं आपको सटीक आंकड़े निकालकर बता सकता हूँ।