Credit Card का ‘Minimum Amount Due’ ट्रॅप:

​क्रेडिट कार्ड इस्तेमाल करने वालों के लिए “Minimum Amount Due” (न्यूनतम देय राशि) सबसे बड़ा छलावा है। यह वो विकल्प है जो देखने में तो राहत देता है, लेकिन असल में यह आपको एक कभी न खत्म होने वाले कर्ज के चक्रव्यूह (Debt ट्रॅप) में धकेल देता है।

​ज़्यादातर लोग सोचते हैं, “अभी पैसे कम हैं, सिर्फ 5% पेमेंट कर देता हूँ, बाकी अगले महीने देख लेंगे।” बस यही वो गलती है जहाँ से आपकी वित्तीय मुसीबतें शुरू होती हैं।

​आइए समझते हैं कि यह गणित कैसे काम करता है और बैंक इससे कैसे पैसे कमाता है।

​1. ‘Minimum Amount Due’ आखिर है क्या?

​जब आपका Credit Card बिल आता है, तो उसमें दो रकम लिखी होती हैं:

  1. Total Amount Due: (कुल खर्चा, जैसे ₹50,000)
  2. Minimum Amount Due: (कुल राशि का छोटा सा हिस्सा, जैसे ₹2,500)

​बैंक यह विकल्प इसलिए देता है ताकि आपका कार्ड “एक्टिव” रहे। अगर आप यह न्यूनतम राशि चुका देते हैं, तो:

  • ​आप पर Late Payment Fee (लेट फीस) नहीं लगती।
  • ​बैंक आपको डिफॉल्टर (Defaulter) घोषित नहीं करता।

​लेकिन, इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि आप ब्याज से बच गए। असली खेल यहीं से शुरू होता है।

​2. असली ट्रॅप: ब्याज का चक्रव्यूह

​जब आप सिर्फ ‘Minimum Amount’ का भुगतान करते हैं, तो बैंक आपसे 3 से 4 तरीकों से पैसे वसूलता है:

  • ब्याज मुक्त अवधि (Interest Free Period) खत्म: क्रेडिट कार्ड पर आमतौर पर 45-50 दिनों का जो फ्री पीरियड मिलता है, वह पूरा बिल न चुकाने पर तुरंत खत्म हो जाता है।
  • शुरुआत से ब्याज: बचा हुआ बैलेंस तो ब्याज पर चढ़ता ही है, लेकिन हैरानी की बात यह है कि ब्याज बिल की तारीख से नहीं, बल्कि जिस दिन आपने खरीदारी की थी (Transaction Date), उस दिन से जोड़ा जाता है।
  • नई खरीदारी पर कोई छूट नहीं: अगर आपने मिनिमम ड्यू चुकाने के बाद कार्ड से कोई नई शॉपिंग की, तो उस पर पहले दिन से ही ब्याज लगना शुरू हो जाएगा। कोई ग्रेस पीरियड नहीं मिलेगा।
  • भारी ब्याज दर: क्रेडिट कार्ड का ब्याज दुनिया में सबसे महंगा होता है—36% से 42% सालाना (लगभग 3-3.5% प्रति माह)।

​3. एक उदाहरण से समझें (असली गणित)

​मान लीजिए आपका बिल ₹20,000 है।

  • Minimum Due (5%): ₹1,000
  • ​आपने ₹1,000 चुका दिया
  • ​बकाया राशि: ₹19,000

​अब आप सोचेंगे कि अगले महीने ₹19,000 पर ब्याज लगेगा। यह गलत है।

बैंक आपसे पूरे ₹20,000 पर ब्याज लेगा जब तक कि आपने पेमेंट नहीं किया था, और फिर ₹19,000 पर ब्याज लेगा पेमेंट की तारीख के बाद।

​इसके ऊपर, जो ब्याज बनेगा, उस पर 18% GST अलग से लगेगा।

नतीजा: अगर आप हर महीने सिर्फ मिनिमम ड्यू चुकाते रहेंगे, तो ₹20,000 का कर्ज चुकाने में आपको सालों लग जाएंगे और अंत में आप मूल रकम से दोगुना पैसा बैंक को चुका चुके होंगे।

​4. सिबिल स्कोर (CIBIL Score) पर असर

​भले ही मिनिमम ड्यू भरने से आप डिफॉल्टर नहीं बनते, लेकिन इसका असर आपके क्रेडिट स्कोर पर पड़ता है:

  • क्रेडिट यूटिलाइजेशन (Credit Utilization): चूंकि आप मूल धन (Principal Amount) वापस नहीं कर रहे, तो आपका यूटिलाइजेशन रेश्यो हमेशा हाई रहता है (जैसे लिमिट का 80-90% इस्तेमाल करना)। यह स्कोर गिराता है।
  • कर्ज का बोझ: बैंक को दिखता है कि आप अपना पूरा बिल चुकाने की स्थिति में नहीं हैं, जिससे आपकी साख (Creditworthiness) कम होती है।

​5. इस ट्रॅप से कैसे बचें? (समाधान)

​अगर आप इस जाल में फंस चुके हैं या बचना चाहते हैं, तो ये कदम उठाएं:

  1. हमेशा पूरा बिल चुकाएं: “Minimum” के विकल्प को अपने दिमाग से हटा दें। अगर बिल ₹20,000 है, तो ₹20,000 ही चुकाएं।
  2. EMI में कन्वर्ट करवा लें: अगर आप फुल पेमेंट नहीं कर सकते, तो बकाया राशि को EMI में बदलवा लें। क्रेडिट कार्ड EMI का ब्याज (13-16%) रिवॉल्विंग क्रेडिट के ब्याज (40%) से बहुत कम होता है।
  3. पर्सनल लोन लें: अगर कार्ड का बिल बहुत ज्यादा बढ़ गया है, तो एक पर्सनल लोन लेकर कार्ड का पूरा बिल क्लियर करें। पर्सनल लोन सस्ता पड़ता है।
  4. ऑटो-पे (Auto-Pay) लगाएं: अपने बैंक खाते में ‘Total Amount Due’ के लिए ऑटो-पे सेट करें ताकि गलती से भी पेमेंट मिस न हो।

​निष्कर्ष

“Minimum Amount Due” का मतलब है “Maximum Interest Cost” (अधिकतम ब्याज लागत)।

बैंक चाहता है कि आप मिनिमम पे करें क्योंकि यही उनकी कमाई का सबसे बड़ा जरिया है। स्मार्ट बनें, पूरा बिल चुकाएं और Credit Card को सुविधा बनाए रखें, बोझ नहीं।

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